मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

सदियों पुराने सवाल

आर.विक्रम सिंह 

कभी कभी सामाजिक सरोकारों के प्रति धर्म की सजगता का सवाल जेहन में उठता है ! शताब्दियों से धर्म , समाज , और भविष्य के सवाल वही के वही ठहरे है ! धर्म से व्यक्तिगत कल्याण की अपेक्षा तो है , लेकिन यह सामाजिक कल्याण और बदलाव के प्रति मुखर क्यों नहीं है ? धर्म चेतना के विकास का माध्यम क्यों नहीं बन पाता ? धर्मगुरु, धर्म के अधिपति इन सवालों के सामने खड़े नहीं होते ! इन सवालों का कोई सामना नहीं करता ! सबसे बड़ी बात यह है कि कोई सवाल भी नहीं पूछता ! धर्म खंड खंड होते समाज के एकीकरण का मार्ग क्यों नहीं खोजता ? कहा खो गयी है तुलसी , कबीर की संत परंपरा ? हम भाग्यवादी है जो ईश्वर चाहेगा वही होगा ! वर्षा ना होने पर हमारी नियति है आकाश की ओर देखना , अपने भाग्य पर संतोष करना और बादलों का इन्तजार करना ! सारा देश साप्ताहिक , वार्षिक भविष्यफल देख रहा है ! टी.वी. पर धार्मिक चैनलों की भरमार है ! वे कीर्तन कर रहे है , लेकिन समाज के सवालों से उनका कोई वास्ता नहीं है !

चूँकि हम सवाल नहीं पूछते,इसलिए जिनके पास जवाब होने चाहिए उन्हें भी चिंता नहीं है ! धर्म गुरुओ को बताना चाहिए कि सदियों से चली आ रही जाति व्यवस्था की समीक्षा की आवश्यकता है या नहीं ? क्या समाज में जाति व्यवस्था अभी भी चलती रहनी चाहिए ? अंतरजातीय विवाह पर धार्मिक नीति की आवश्यकता है या नहीं ? जिस तरह हिंदू पंथ मानने वाले बहुत से लोग ईसाई व मुस्लिम हो चुके है , क्या उसी तरह हिंदू धर्म में भी इस प्रकार की व्यवस्था है कि अन्य मतावलंबी भी इसमें सम्मिलित हो सके ? फर्ज करे कि किसी महान प्रेरणा से यदि अमेरिका का राष्ट्रपति हिंदू बनना चाहे तो वह क्या करे ? उसे किस वर्ण में रखा जाएगा ? चीन ,जापान , कोरिया, दक्षिण अफ्रीका आदि देशो में बसी उन सभ्यताओ में भी , जिनका ईसा मसीह से कोई वास्ता नहीं है , बहुत से लोग ईसाई हो चुके है ! सनातन धर्म अपनी इतनी समृद्ध सांस्कृतिक एवं दार्शनिक परंपरा के बावजूद ऐसा क्यों नहीं कर सका ? यह किसकी असफलता है ? बहुत से सवालो को जवाब की तलाश है , लेकिन सवाल पूछने वाले नहीं है ! 

हमें भरोसा नहीं है कि सवाल पूछे जाने से भाग्य का मार्ग बदल सकता है ! इतिहास गवाह है कि सभ्यताओं में जो भी विकास किया है वह सवालों से झूझने से हुआ है - उनसे बचकर निकलने से नहीं ! अपने यहाँ जब समाज को वर्णों और फिर जातियों के खानों में बाँट दिया गया तो सवाल पूछने वाला कोई नहीं बचा ! प्रश्न बुद्ध ने पूछे उत्तर खोजे ! इसी से ही हमारे सनातन धर्म के एक महान पंथ का उदय हुआ ! यह एक अलग बात है कि विश्व के बहुत से देशो में यह पंथ बौद्ध धर्म के रूप में जाना गया ! सवाल ना पूछे जाने से ही हमारी समाजिक व्यवस्था आज भी वही है जहां मनु स्मृति ने उसे छोड़ा था ! क्या हमारे समाज की धार्मिक विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है ? यदि ऋषियों ने वेदों को ही अंतिम मान लिया होता तो वेदान्त ना आते, गीता ना आती , आदि शंकराचार्य ना हुए होते ! यदि धर्म की प्रवाहमान धारा वेदों के बाद ही रुक गयी होती तो हमारा धर्म कितना एकांगी होता ! यदि वैदिक आर्यगण कहते कि यही वेद का अंतिम सत्य है , इसके बाद कुछ भी नहीं कहा जायेगा तो वेदों के अतिरिक्त आज और कोई ग्रन्थ ना होता , लेकिन हमारी धर्म सरिता प्रवाहित होती रही , जबकि अन्य मजहबो में प्रवर्तकों ने जब एक पुस्तक लिख दी या विचार संकलन प्रस्तुत कर दिए तो उसे ही अंतिम मान लिया गया ! 

सनातन धर्म की महान आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग में बुद्ध के प्रति नकारात्मक दृष्टि धर्म के स्वभाविक प्रवाह को रोकती है ! यह रोकना वैदिक ऋषियों द्वारा प्रदर्शित परंपरा व प्रकृति के विपरीत है ! बुद्ध की धारा यदि यहाँ प्रवाहित रहती तो और भी परिष्कृत होकर सामने आती ! बुद्ध सदियों से भाग्यवाद को प्रस्थान करते है ! सवालों से झूझते है ! समाधान का उपक्रम करते है ! हमने उन्हें अपने यहाँ चुप करा कर सवाल पूछने की प्रक्रिया ही रोक दी ! हो सकता है इसलिए हमारा धर्म हमारी सामाजिक समस्याओ के समक्ष खड़ा नहीं हो पा रहा है ! धर्म की क्षमता , महानता को विश्व के सम्मुख स्थापित करना भी एक विवेकशील , तर्कपूर्ण सोच से संचालित संगठन का कार्य है ! दुर्भाग्यवश हमने तर्क का साथ छोड़ दिया है ! जो धार्मिक नेतृत्व अपनी ही क्षुद्र समस्याओं में उलझा है, अपने ही समाज को मानसिक गुलाम बनाकर प्रसन्न है वह समाधान क्या करेगा ? हम लोग अपने समाज को बरगलाया करते है कि वह महानता के दिवास्वप्न में न रहे , सवाल ना पूछे ! क्योंकि प्रश्नों से सुरक्षित हमारा धार्मिक नेतृत्व दिवास्वप्नो के छलावे के अलावा और दे क्या सकता है ? 

( लेखक  पूर्व सैन्य अधिकारी है और सम्प्रति कानपुर उ.प्र. में नगर आयुक्त है )

36 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बेबाक प्रश्न है जो कि हमारे धार्मिक नेतृत्व को सोचने पर मजबूर करते है !
    रवीन्द्र कुशवाहा
    दरभंगा

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  2. Aap ke soch ko salam... hum sab ko iske liye ek saath aage aana hoga aur Dharmguruvo ki ko unki gehan nindra se uthana hoga... Tabhi ye badlav aaye ga...
    Anoop Mishra

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  3. mai anoop ji se sahmat hun.

    abhimanyu singh

    jodhpur raj.

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  4. yes sir u r right ........ agar ques nahi honey to ans ki koi jarurat nahi hogi ....... aur nahi hum aagey ja payenge ........... aut history is bat ka prove h ki ...... hamesha kuch logo ne ques puchey h ....... jinka ans dete huey naye garntho ka nirman hua h .......... aagey bhi aisa hi hote rahega ..........aur bharat vishav me sabse uper virajman rajega ............ jai shree ram ...




    aur jaha tak bat h kisi aur dhara ke logo ka hinduism join karne ka ......... to hindu jati open h sabke liye ...... koi bhi join kar sakte h isse......... sirf hamare karmkand thode jatil banate h hamare dharam ko . varna hamara dharam sabse saral aur aasani se samaghey ja sakta h :-

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  5. Until you believe the theory of foreign offences and social descriminations related with foreign offences.. No one can give you any substantial vision or way.
    Example: you wrote this article in Hindi i appreciate it, but could you please tell me the History of Hindi?
    You may be proud of being most ancient heritage on earth, but can declare the dates of the origin of the Indian Heritage or the civilization..?
    If you give me substantial answers of these basic questions of the most important subject History then we can think of our present accordingly and estimate the future of the Indian demography.

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  6. very nice and impressive article..

    ravi chandra

    mumbai,

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  7. sachhe baat hai aur inka jawab milna hi chahiye kyuki ab samay aa gaya ki hamare dhrmguru saamne aaye aur koi rasta nikale .

    naveen saraswat
    aligarh

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  8. सनातन धर्म की विशेषता रही है इसका सतत प्रवाह. अन्य धर्मों की तरह एक बिंदु पर आकर ठहर जाना तो जड़ता को आमंत्रण है. मुझे लगता है , पिछले १००० वर्ष की गुलामी ने जैसे इस प्रवाह को अवरुद्ध कर दिया है.वर्तमान धर्मिक नेतृत्व तो लगता है, जैसे १००० साल पुरानी स्थिति में ही खड़ा है. इस जड़ता के कारण हमारी स्वस्थिति इतनी कमजोर हो गयी है की हर परस्थिति हमें रौंद जाती है. चेतावनी है इस धार्मिक नेतृत्व को की यदि वे स्वयं परिवर्तन या दोष निवारण की दिशा में न चले तो समाज का प्रबुद्ध वर्ग यह नेतृत्व अपने हाथ में ले लेगा.जैसे आंबेडकर आदि.
    आपका प्रश्न है की अन्य धर्मों से आये लोगों को किस वर्ण में रखा जायेगा, तो निश्चय ही जो उनका आजीविका का माध्यम होगा वो उसी वर्ण में होंगे. समस्या चारो वर्णों को बराबरी पर न रखने से है. मेहनत से आजीविका कमाने वाला वर्ण , केवल बुद्धि से अथवा केवल ताकत से आजीविका कमाने वाले वर्ग से कमतर क्यों? समाज में मजदूर को सम्मान, अध्यापक से कम क्यों? शायद बहुत छोटे छोटे वर्गों में समाज का बंट जाना इस गैर बराबरी का कारण है. अब पुरानी वर्ग व्यवश्था को त्याग कर यदि केवल १ शब्द,' भारतीय ' के नाम पर सब पहचाने जाएँ तो शायद कई समस्याओं का समाधान मिले. अमेरिका के न्यूजर्सी में लाखों भारतीय / भारतवंशी रहते हैं. वहां वे सब भारतीय के रूप में ही एक दुसरे को जानते पहचानते है.दलित,दबंग,ब्राह्मण ,शूद्र, जाति,बिरादरी जैसे शब्दों का तो अस्तित्व ही नहीं है उनमें. काश! ऐसा भारत में भी हो!.

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  9. bada hi gmabhir parshn apne uthaya hai sir vastav me her chiz ka theka lene wale ye dhrmacharya samaj ke prati apne naitik dayitav se bachte rahte hai. jinka kam samaz ko sahi raha dikhna hota hai par vo aaj khud galat karyome lipt paye jaate hai aise me inse saamaz ke utthan ki asa rakhna apne aap me ek bevkufi bhara kary hai

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  10. hamara samaj kyon chinta karte hai kuch he dino ki toh baat hai shaadi pariwaar kya ekal aur kya sanyukt naam ki yeh saari sanstha apni samapti par hai phir ziyenge hum wahi jeevan jo aadi kaal ya old stone age mein jiya karte the . jiska jor chalega woh kisi ki bhi beti ya maa ke saath balatkar karega jiski patni jisse chahe sambhog karayegi aur jiski beti jise chahe raat mein ghar par laa kar uske saath soyegi aur hamara kanoon use bhi jayaj thehrayega . aaj hum haste hai kal rone ka bhi kaaran nahi milega . .

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  11. AGAR HAMARE DHRMGURU MAYA KE PRATI APNA MOH CHHOD KAR SAMAJ KE LIYE KUCH KARE TO IN SAWALO KE JAWAAB BHI DE PAYENGE.

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  12. Our history is a perfect mirror to the fact that all enlightened citizens who contributed towards making this society a better place to live in were great philosophers and their deep insights into the subject urged them to ask questions.

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  13. प्रिय भारतवासियों ,
    गंगा सेवा मिशन ''माँ गंगा के निर्मलता एवं अविरलता के लिए कृत संकल्पित
    अंतर्राष्ट्रीय संगठन है.''

    गंगा सेवा मिशन उ.प्र.द्वारा दिनांक्क ११/१२/२०११ दिन रविवार को दोपहर २ बजे से शाम ५ बजे तक G.P.O.पार्क हजरत गंज (लखनऊ) से शनिदेव मंदिर गोमती तट (लखनऊ) गंगा चेतना पदयात्रा तथा गोमती तट की सफाई , पूजा -आरती की जायेगी !
    इस पदयात्रा में गंगा सेवा मिशन के राष्ट्रीय अध्यछ परमपूज्य स्वामी श्री आनंद स्वरुप जी महराज तथा राष्ट्रीय महामंत्री श्री तारा चन्द्र मोर जी भी सम्मलित रहेंगे ,जिनके निर्देशन में पूरे भारतवर्ष में लगातार कार्यक्रम चल रहा है !
    अत: इस पुद्द्य कार्य में सपरिवार सम्मलित होकर पुद्द्य के भागी बने एवं अपनी विलुप्त होती संस्कृति (माँ गंगा) की रक्छा के लिए संकल्पित हो !

    ''जय श्री गंगे''
    निवेदक :-
    धर्म प्रकाश उपाध्याय ''रोहित''
    प्रदेश महामंत्री
    गंगा सेवा मिशन उ.प्र.

    मो.+91 - 9453166457

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  14. सृष्टि के आदि से लेकर आजतक सत्यज्ञान हमें ऋषियों के द्वारा मिलता रहा है | ज्ञान के वाहक ऋषिगण होते हैं | कर्तव्य-अकर्तव्य, पुण्य-पाप, धर्म-अधर्म, गुण-अवगुण, लाभ-हानि, सत्य-असत्य, हितकर-अहितकर, आस्तिक-नास्तिक आदि तथा ईश्वर का परिज्ञान हम मनुष्यों को ऋषि मुनि ही बतलाते हैं | ऋषिगण अपूर्व मेधा सम्पन्न, ईश्वर के संविधान के महाविद्वान, निस्वार्थी और परम दयालु होते हैं | इनका प्रत्येक उपदेश और कार्य प्राणिमात्र के हित के लिये होता है | वर्तमान कालीन देश-प्रान्त आदि की सीमाओं में इनका ज्ञान और कार्य बंधा हुआ नहीं होता है, परन्तु इस विश्व में प्रत्येक मनुष्यमात्र के लिये इनका उपदेश और कार्य होता है, यथार्थ में ये ऋषि - मुनि ही देश काल की सीमाओं से परे जाकर मनुष्य मात्र के कल्याण और उन्नयन के लिये कर्म और उपदेश करते हैं, वास्तव में ये ऋषि - मुनि ही मनुष्य ही नहीं अपितु प्राणिमात्र के सच्चे हितैषी होते हैं, इनका उपदेश हिन्दु, मुस्लिम, ईसाई, पारसी, जैनी, बौद्ध आदि-आदि विश्व भर में प्रचलित समस्त मत - पन्थों एवं सम्प्रदायों के अनुयायियों के लिये भी एक जैसा होता है, ये ही सच्चे अर्थों में मानवीय होते हैं| ऋषियों का ज्ञान सत्य, तथ्य, तर्क और यथार्थ वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित होता है| जिनके सिद्धान्तों को किसी भी काल में और किसी के भी द्वारा काटा नहीं जा सकता है, इनका सिद्धान्त ईश्वरीय सिद्धान्तों एवं उनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान पर अवलम्बित है| सृष्टि के प्रारम्भ के ऋषियों से लेकर महाभारत कालीन ऋषियों यथा ऋषि व्यास , ऋषि जैमिनि, ऋषि पतन्जलि, ऋषि कणाद, ऋषि कपिल, ऋषि गौतम, ऋषि यास्क और पराधीनता के काल में ऋषि दयानन्द से हमें विश्व भर के मनुष्यमात्र के लिये करणीय और धारणीय ईश्वरीय ज्ञान मिला है|
    ऋषियों में ऋषि दयानन्द हमारे सबसे निकट काल में हुये हैं, इसलिये प्राचीन सभी ऋषियों के ज्ञान और कर्म को ये अपने में समेटे हुये है| और इनका उपदेश, कर्म और साहित्य विपुल रूप में हमारे सम्मुख है | जिससे हम सरलता और स्पष्टता से सत्य को जान सकते हैं, समझ सकते हैं, धारण कर सकते हैं और इस सत्य पथ पर चल सकते हैं| वैदिक सिद्धान्तों अर्थात आर्ष सिद्धान्तों के परिज्ञान के लिये प्रमुख रूप से गुरुकुलीय विधा से विद्द्या ग्रहण और आर्ष ग्रन्थों का स्वाध्याय है| वर्तमान काल में आर्य परम्पराओं के छिन्न-भिन्न हो जाने पर आर्य सिद्धान्तों के प्रमुख-प्रमुख सिद्धान्तों के परिज्ञान के लिये सर्वोत्तम, अल्पकालिक और संक्षिप्त विधा है आर्य प्रशिक्षण सत्र और आर्या प्रशिक्षण सत्र जो राष्ट्रीय आर्य निर्मात्री सभा के द्वारा आयोजित होता है| वर्तमान में इसका कार्य क्षेत्र भारतवर्ष है| भारतवर्ष में मुख्य रूप से हरियाणा प्रान्त, दिल्ली प्रान्त, उत्तरप्रदेश प्रान्त, मध्यप्रदेश प्रान्त, उत्तराखन्ड प्रान्त और राजस्थान प्रान्त में आयोजित होते हैं| सत्य के जिज्ञासु, वेद के जिज्ञासु और मानवामात्र के हिताकांक्षी अवश्य इन सत्रों में सम्मिलत होकर सत्य ज्ञान ग्रहण करें, वर्तमान काल में जितना और सैद्धान्तिक परिज्ञान आप दस वर्षों में भी स्वयं परिश्रम करके नहीं अर्जित कर सकते हैं, उससे अधिक और सुदृढ बोध आप इन द्विदिवसीय सत्रों में ग्रहण कर सकते हैं|इन द्विदिवसीय सत्रों के उपरान्त आपके लिये सत्य और वेद का द्वार खुल जाता है आप वैदिक धर्म में प्रवेश पा लेते हैं और इससे आप ऋषियों के द्वारा रक्षित और सिंचित सत्य पथ के पथिक और वाहक बन जीवन के उद्देश्य को प्राप्त कर सकते हैं|

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  15. please visit for satra: http://www.aryanirmatrisabha.com/index.aspx

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  16. Jawab dena to dur bhai yeh dharm guru hi hai jo sahi raste jaane hi nahi dete, yeh admi ko apni philosphy me aisa uljha dete hai ki acha khasa admi confuse hokar usi chakkar me ghumne lagta hai

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  17. अभिषेक सिंह , बागपत7 दिसंबर 2011 को 8:09 pm

    इस लेख पर किसी धर्मगुरु की भी राय लीजिए प्रवीण जी,
    कोई तो राह मिलेगी !

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  18. दोस्तों,

    मै इस लेख को तमाम आदरणीय आचार्यो ,धर्मगुरूओ को उनकी राय के लिए भेजा था ताकि उनका मार्गदर्शन हमें प्राप्त हो सके ! लेकिन हम अभी भी प्रतीक्षा में है !

    प्रवीण

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  19. मैंने पढ़ा था कि बुद्ध भगवान पुनर्जन्म तो मानते थे लेकिन आत्मा के अस्तित्व को नहीं. फिर बौद्ध अनुयायीयों ने बुद्ध भगवन के शरीर से आत्मा को कैसे निकलते दिखाया है. क्या कालांतर में बौद्ध भी ये मानने लगे थे कि पुनर्जन्म का सिद्धांत सत्यापित होने के लिए किसी एक माध्यम (आत्मा) का होना जरुरी है. बुद्ध देव ने भी आत्मा विहीन पुर्नजन्म को जिन उदाहरानो से समझायाथा जैसे कि लहर और ध्वनि वो भी बिना किसी माध्यम के एक के नष्ट होने पर पुनर्जीवित नहीं होते हैं. और इस तरह से आत्मा होने के विश्वास को पुनः एक आधार मिला और कालांतर में हिन्दू और बौद्ध का एक मूल अंतर जो था वो भी समाप्त हो गया. और क्या इसी तरह से आत्मा के सिद्धांत को बल मिलने के कारण शंकर को अद्वैत प्रतिपादित करनेकि एक मजबूत पृष्ठभूमि मिली जिसने किहिन्दू धर्मं को एक बार फिर से जागृत कर दिया.

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  20. सुरेश मिश्र , कानपुर7 दिसंबर 2011 को 11:42 pm

    Aapke lekh me kai prsn hai jinka uttar mai mai binduar apni samajh se dunga
    pahlee baat dhermq kya hai mere samajh se
    mandir jaana dherm nahi hai
    pooja path dherm nahi hai
    katha padhna kahna ya sunna bhi dherm nahi hai
    phir dherm kya hai yeh vyktigat hai ya samajik yeh alag prsn hai jiska jawab mere anusar hai
    1.srsti ke pahle purush manu wa stree satrupa ke saath hi unka dherm aaya isliye dherm kee suruat vyktigat hi hui
    2.phir pariwar bana aur pariwar ke leye bane niyam pariwar dherm kahlaya
    3.pariwar se samaj bana aur samaj ke aapse vyohar ko niyantreet karne ke niyam smaj dherm kahlaye
    udahren ke liye hum ram ko bhagwan unke pariwar aur samaj ke liye kiye gai karyon ki wajah se mana aur use dherm mana na ki wo bade pujari the gyani the ya unhone rameswarem ki sthapna ki
    esliye RAM jaisa aachran dherm hai na ki ram ram japna
    ise aise bhi kah sakte hain RAMAYAN ki mano
    RAMAYAN ko nahi
    aage phir

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  21. रूपचन्द्र उपाध्याय, कानपुर7 दिसंबर 2011 को 11:51 pm

    सबसे बड़ी समस्या यही है कि हम हिन्दू है न कि भारतीय ,ये हिन्दू शब्द ही वाह्य सभय्ताओ का थोपा हुआ है ,वर्ना यह प्रश्न ही न पैदा होता ,भारतीय सामाजिक व्यवस्था वर्ण आधारित है किन्तु कर्म के आधार पर ,यदि इस प्रकार से आप विवेचन करे तो कोई समस्या ही नहीं ,यदि कोई अन्य धर्म का अनुयायी भारतीय सामाजिक व्यवस्था को अंगीकार करना चाहे उसे उसके कर्मानुसार वर्ण में समायोजित किया जा सकता था .

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  22. धर्म कभी भी जटिल नही होता है, और इसमें आने के रास्ते भी ना तो जटिल होते हैं और ना हि बंद| जाती व्यवस्था जो की अब भी है, ये उसी जटिलता का उदाहरण है, धर्म सभी लोगों के लिए समान है भगवान किसी को भी जाती के नाम से नही पहचानते हैं, हिंदू समाज को विखंडित करने और पीछे धकेलने में उन सभी का बहुत ही योगदान है जिन्होंने धर्म को जटिल और जाती व्यवस्था को जारी रखा है, जाती व्यवस्था उस समय की तात्कालिक आवश्यकता हो सकती है पर आज भी इसे बदस्तूर जारी रखना अन्याय पूर्ण है|
    अगर कोई भी व्यक्ति दूसरे धर्म से आकार सनातन संस्कार धारण ग्रहन करता है तो उसे हमें ब्राह्मण मानना चाहिए क्यूंकि ब्राह्मण का अर्थ होता है ब्रह्म अर्थात ज्ञान को धारण करने वाला और उन महोदय की ज्ञान की झलक तो झलकती ही है इस समृद्ध और संस्कारित धर्म ग्रहण करने से अत: उन्हें हमें ब्राह्मण मानना चाहिए|

    www.ekhidhun.blogspot.com
    www.chandankrpgcil.blogspot.com
    www.dilkejajbat.blogspot.com
    पर कभी आइये स्वागत रहेगा
    आभार!

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  23. सुमित अवस्थी , कानपुर7 दिसंबर 2011 को 11:58 pm

    आपके लेख में लिखे हर सवाल गंभीर है ... और महत्वपूर्ण भी ...लेकिन सही मायने में मेरा मानना है की सच्चाई बहुत ही कडवी होती है ....आज हम और आप ह़ी आपने को बदलना नही चाहते तो इसमें हम दुसरो पर प्रश्न उठाये तो ये शायद अनकूल नही है ....आज बदलते वक्क्त ने ये सिखा दिया है की जैसा देश वैसा भेष ..और शायद यही वजह है की धर्म गुरु हो या फिर संत ....उनकी किस बात या कौन से मार्ग को लोग चुने ...इनकी कथनी और करनी की कसौटी पर जब वे खुद ही गंभीर नही है तो उनके द्वारा किस मार्ग को रौशनी मिलेगी ...पहले हमें अपनी सोच को बदलना होगा हम जानकार भी गलत मार्ग अपनाते है .....कुछ पल धर्म ,संस्कृति ,कर्तव्य की बात करते है क्या अच्छा ..क्या बुरा सभी पहलुओ पर चर्चा करते है लेकिन इनको आपने जीवन और समाज में कितना अमल कर पाते है ..तो इसलिए पहले हमें जागना होगा

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  24. मनु स्मृति से आज तक जितने झंजावातों से हमारी संस्कृति गुजरी है वेह आज अपंग हो गयी है जंग लग गयी भारतीयता की पहचान को दिन पर दिन आध कचरे अपरिपक्वा विचारक इसकी आत्मा को लहोलोहान करते जा रहे हैं हम पहले से ज्यादा अविकसित और मानसिक रूप से खोखले होते जा रहे हैं. हमारे सवाल हमारे अहम मैं गुम होते जा रहे हैं. छद्म रास्त्रवाद की अविकसित सोच के जंगले में घुसते जा रहे हैं दिन पर दिन सनातन विचार धारा कुंठित होती जा रही है हम अपनी चारूं और बनायीं दीवार में कैद होते जा रहे हैं. वजह साफ़ है हमने अपनी बुराइयों को अपने से बड़ा बना लिया है और उसी जाल में उलझते जा रहे हैं

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  25. वाचस्पति द्विवेदी8 दिसंबर 2011 को 12:38 am

    विचारों और संस्कारों की बेड़ियाँ हमारी अस्मिता देश की संप्रभुता और देश की नैसर्गिक स्वयं के विकास की मूल प्रव्रत्ति को नयी सोच कुंद,दिगब्रह्रमित पथ अप्वंचक कर रही है

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  26. दरअसल हम धर्म का मूल अर्थ जानते ही नहीं। समय मिले तो सत्‍यार्थ प्रकाश पढियेगा। तमाम शंकाओं का निवारण हो जायेगा। सत्‍य की खोज और जिज्ञासाएं तो अनवरत चलने वाली प्रक्रियाएं हैं। इस लेख में जो सवाल उठाए गए हैं उनसे काफी हद तक मैं सहमत हूं।

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  27. आदरणीय सिंह साहब, आपने थोड़े शब्दों में कि कई ऐसे तंतु छू दिए जो हमारी जिंदगी से पूर्णरूपेण जुड़े हुए हैं, सर्वप्रथम धर्म और समाज के तारतम्य का, धर्म और समाज के बीच त्रिशंकु बनाने वाले हमारे धर्म प्रचारक कहलाने वाले भगवाधारी ब्रिगेड जोकि आज एक माफिया का हि रूप ले चुके हैं, उन्होंने व्यवसाय के रूप में देखने के कारण केवल अपना निजी हित देखते हुए बस धर्म को अपनी दूकान बना के , लच्छेदार भाग्यवादी बातो के पुलिंदे बेचने के अलावा शायद ही कोई और काम किया हो पूरी बीसवी सदी में. मशहूर से मशहूर धर्म प्रचारक देख लीजिए बस उसने अपने आश्रमो और अनुयायियों कि संख्या बढ़ाने के सिवा और नहीं कुछ सोचा, येही पतन का मूल है, धर्म को धारण करने के बजाय बाजारू वस्तु बना दिया गया. धर्म एक अनओर्गेनाईज्ड सेक्टर में आता है, जिसमे आधुनिक परिदृश्य में कोई एक अमली जामा पहनाने वाला सिस्टम या रुटीन नहीं संभव, इसीलिए विभिन्न्प्रकार के मत पंथ इत्यादि किसी सीमा में नहीं बंधे जा सकते, और हरेक मत अपने आप को सर्वश्रेष्ठ घोषित करने कि दौड में है, क्योकि इससे अनुयायियों कि लीडरी भी चमकती है. तो फलसफा ये है कि आपने जो सामाजिक रूप से धार्मिक पतन का चिंतन दिया, उसका मूल येही है कि धर्म को धारण करने कि बजाय बाजारू और सजावट कि चीज ज्यादा समझा गया और नीति नियंत्य जो कुछ सही थे उनको मार मार के हरिद्वार भगा दिया गया. अब टतूती बोलती है बस गलत लोगो की.. और आने वाले समय में अगर जागरूकता ना आई तो आपके जैसे चिंतन करने वाले भी नहीं बचने. येही दिख रहा है फिलहाल, आगे तो सब ईश्वर कि ही माया है.

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  28. bilkul sahi kaha aapne mai sahmat hu,log corruption aur kinhi dusro ki satta aur kinhi tujhha karno me hi jhujhh rahe hai.is ore kisi kea dhyaan hi nahi hai.

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  29. पूरे लेख का सार सिर्फ़ इन पंक्तियो मे है "सारा देश साप्ताहिक , वार्षिक भविष्यफल देख रहा है ! टी.वी. पर धार्मिक चैनलों की भरमार है ! वे कीर्तन कर रहे है , लेकिन समाज के सवालों से उनका कोई वास्ता नहीं है !चूँकि हम सवाल नहीं पूछते,इसलिए जिनके पास जवाब होने चाहिए उन्हें भी चिंता नहीं है !हमें भरोसा नहीं है कि सवाल पूछे जाने से भाग्य का मार्ग बदल सकता है !

    पर सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है, की किसी के पास इतना सोचने का वक़्त ही नही है, सबसे आसान तरीका उन्हे लगता है जो हो रहा है उसे होने दो,हमे कोई दिक्कत नही हो रही है, तो हम क्यो सवाल जवाब के चक्कर मे पड़े,

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  30. सही कहा ये विचार नहीम ये वेदना है अपने समाज के प्रति,,,
    हम आज बात करें आज के धर्माचार्यों की तो वो सिर्फ़ दिखावटी मापदंडों की बात करते हैं त्याग, श्रद्धा की बातें और जब कुम्भ होता है तो शाही स्नान में अपने झूठे अहंकार का पोषण करने के लिये संघर्ष,,,,
    ये मूर्ख हैं या अपने धर्माचार्य होने के दम्भ में जी रहे हैं !
    बात आज हम करें धर्म की तो धर्म है क्या,,,,,
    क्या सिर्फ़ तिलक लगाना, चोटी रखना धर्म है,,
    मंत्र उचारण करना ही धर्म है......
    धर्म है मीरा की तरफ़ नाचना,,,,
    धर्म योग की बात करता है,,,
    हम किसी पैदा होने वाले धर्म को नहीं मानते हमारा धर्म सनातन है,,,उगता सूर्य है,,,पूर्ण वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित है,,,हमारे यहां वएद हैं आयुर्वेद है, ज्योतिष है, योग प्राणायम है,,,,
    परन्तु धर्म को पेटेण्ट की तरह इस्तेमाल करने वाले इस धर्म के ठेकेदारों ने पंडीत, पुरोहितों, धर्माचार्यों आदि ने खा लिया इस धर्म को,,,धर्म के विषय में वेद कहता है,,,,
    आहार निद्रा भय मैथुनं च
    सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् ।
    धर्मो हि तेषामधिको विशेष:
    धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥
    आहार, निद्रा, भय और मैथुन – ये तो इन्सान और पशु में समान है । इन्सान में विशेष केवल धर्म है, अर्थात् बिना धर्म के लोग पशुतुल्य है ।
    आज उस धर्म को क्या बना दिया,,,,,धर्म के नाम पर निचले समाज के लोगों का तिरस्कार किया गया, उन्होने इस्लाम-इसाईयत कबूल की क्यों की,,,हमारे धर्माचार्यों धर्म के ठेकेदारों के कारण,,,
    आज आप किसी भी हिन्दू सन्त का प्रवचन सुनिये लोगों को दिशाभ्रमित कर रहा है,,,दुनिया चांद पर जा रही है,,,ये लोगों को अपनी विद्या के द्वारा छल रहे हैं,,,,
    हम सिर्फ़ अहंकार करते हैं कि हमारे ग्रन्थ सिर्फ़ श्रेष्ट हैं हम किसी को मानना ही नहीं चाहते हम सिर्फ़ कुंए के मेढक की तरह फ़ंसे रहना चाह्ते हैं और इस सब का खेल ये कथाकथित धर्माचार्य चला रहे हैं
    वेद कहता है संचय नहीं होना चाहिये आज गेहस्थों से अधिक संचय सन्यासियों के पास है क्यों ?
    हमारी मुर्खता के कारण हम सिर्फ़ मानते हैं जानना चाहते ही नहीं ,,
    कुंए के मुढक की तरह,,,,
    हम भगवान राम को मानते हैं उनके द्वारा बताए आदर्शों को नहीं मनते आज इस देश ही नहीं समूचे विश्व में लोग सिर्फ़ मानते हैं जानना नहीं चाहते,,,,,
    और हमारे धर्माचार्य चाहते भी नहीं कि हम जानने की यात्रा करें ,,,
    दुनिया ने कम्पुटर खोज लिया पर हम आज भी बिल्ली के रास्ता काटदेने से परेशान हैं,,,,आखिर क्यों,,,
    आज हमारे धर्म स्थलों पर व्यापार हो रहा है,,,क्यों हमारे कारण ....हम सो रहे हैं,,,,,हम परमात्मा को छोडकर धर्माचार्यों को पूज रहे हैं ,,,,,,
    आज हम धर्म को नहीं मानते हम धर्म के ठेकेदारों को पूज रहे हैं,,,
    धर्म परंपराओं रुढियों में बाधने का नाम नहीम है धर्म कहता है उन्मुक्त गगन में उढो,,,
    धर्म मुस्कुराने का नाम है,,,,
    जो हमारा होना चहता है, उसे गले लगाना ही धर्म है,, उसे अपनाना धर्म है,,,,,
    आज धर्म का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है देखर्कर कष्ट होता है ,,,,आज ज्योतिष के नाम पर कोई छ्ल रहा है कोई अनुष्ठान के नाम पर छल रहा है,,,,
    धर्म के ठेकेदार दूसरे धर्म की बुराई करते हैं,,,,
    ये सभी मनुष्य के शरीर में पशु हैं .....
    मुस्कुराओ और सभी से प्रम करो यही धर्म है,,,,,
    किस बात का अमिमान कि मैं बृम्हण हूं मैं क्षत्रिय हूं .....
    मुस्कुराओ निर्मल सरिता की तरह बहॊ,,,परमात्मा तुम्हें गले से लगा लेगा,,,,,
    तोड़ दो सारे बंधन,,,,धर्म की घुंघरू बाध के नाचो,,,,

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  31. vedas are foundation and knowledge base of sanatan dharma.Vedas are original knowledge , a source from which many religions have sprouted in India.Vedas are Just like Sun , source of light and knowledge .Vedas has been and always remain relevant as they are source of truth .Remember major job of any avataar has been protection of vedas. Also eventhough always present vedas become relevant ony during critical times when humans cannot find any solutions through scientific/modern ways.
    Basic Indian culture , traditions , festivals are all based on vedas which teaches a harmonius way of life , protecting nature .It provides a sustainable model of living in earth where we consume little natural resourses. Vedas have solution to All present day problem , if we try to understand and believe in them .Worshipping rivers , trees , mountains is like protecting mother earth and our future generations.

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  32. सिंह साहब , जैसा की आप ने कहा की ..... जिस तरह हिंदू पंथ मानने वाले बहुत से लोग ईसाई व मुस्लिम हो चुके है , क्या उसी तरह हिंदू धर्म में भी इस प्रकार की व्यवस्था है कि अन्य मतावलंबी भी इसमें सम्मिलित हो सके ? फर्ज करे कि किसी महान प्रेरणा से यदि अमेरिका का राष्ट्रपति हिंदू बनना चाहे तो वह क्या करे ? उसे किस वर्ण में रखा जाएगा ............... आपकी बात सही है जो हिंदू बनना चाहेगा उसको आप और हम कर्म के आधार पर वर्ण में रख सकते है जैसा की वेदिक युग में होता था जाति के आधार पर नहीं कर्म का मूल्यांकन होना चाहिए ......... इति शुभम

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  33. सुरेश मिश्र , कानपुर8 दिसंबर 2011 को 10:09 pm

    Aapka dusra prsn jise aapne underline karke mahtve dia
    q.Amrika ka rastrepati hindu hona chahe to
    Ans. use kuch nahi karna padega qkee eswar ne sabka janm hindu ke roop me he diya hai yahan par use
    eesai hone ke liye baptisma lena padta hai
    muslman hone ke liye khatna karana padta hai
    sikh hone ke liye amret chakna
    jain ke liye mahveer
    baudhe ke liye budha aadi
    kintu murtee puujak ya kisee bhee roop me eswar ko manne wala aastik bhee hindu
    aur kisi devta pustak puuja padhhati ko na manne wala nastik hindu
    kya aisa kisi aur samprday me sambhau hai
    yedi mera ye chota sa utter jisme kay aur prsno ke bhee utter hain sahee laga hoo too iska jawab jarror de baaki baad me..

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  35. In this context i have very solid experience.i am a doctor practicing in delhi.a person came to me and started giving lecture on bible like what is bible and how to read that though he was hindu but later got converted into christian.i first listened him patiently then one day i gave him a short lecture from shri madbhagwat geeta to prove my point that KRISHNASTU BHAGWAN SWAYAM means krishna is himself the GOD and today the result is that he has left everything and reads shri madbhagawat geeta daily.imagine he is a man 60 years old and to my surprise he one day tried to touch my feer but i stopped and suvgested him to touch the holy feet of KRISHNA
    thanks
    dr.rohit consultant infertility specialist
    +919818303663
    Delhi

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